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LIC Health Shield Plan (907): पूरी जानकारी, बिना किसी उलझन के

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LIC Health Shield क्या है और किसके लिए बना है: शुरुआत एक सीधी बात से। जब घर में कोई अस्पताल में भर्ती होता है, तो सिर्फ इलाज का बिल नहीं आता। साथ में आता है रोज़ की कमाई का रुकना, आने-जाने का खर्च, तीमारदारी में लगे किसी एक की छुट्टी और वे सारी छोटी-छोटी चीज़ें जो किसी बिल में नहीं लिखी होतीं। LIC Health Shield इसी खाली जगह को भरने की कोशिश करता है।

LIC का यह प्लान भारतीय जीवन बीमा निगम की नई हेल्थ पॉलिसी है, जिसका UIN 512N369V01 है। ब्रोशर इसे नॉन-पार, नॉन-लिंक्ड, इंडिविजुअल और प्योर रिस्क प्लान बताता है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि इसमें न कोई बोनस मिलता है, न शेयर बाज़ार से जुड़ा कोई फायदा। यह निवेश नहीं है, सिर्फ सुरक्षा है।

LIC Health Shield Plan: पूरी जानकारी

तरीका भी सीधा है। आप पहले से एक रोज़ की रकम चुनते हैं, जिसे डेली बेनिफिट कहते हैं। अस्पताल में भर्ती होने पर, सर्जरी होने पर या कुछ खास बीमारियों में LIC उसी रकम के हिसाब से पैसा देती है। बिल कितना भी बने, भुगतान उसी तय गणित से होता है।

पॉलिसी लेने वाले को ब्रोशर में प्रिंसिपल इंश्योर्ड कहा गया है। उसके साथ पति या पत्नी, बच्चे और माता-पिता भी इसी पॉलिसी में आ सकते हैं। यानी एक पॉलिसी, एक प्रीमियम और पूरा परिवार। हां, इसकी कुछ शर्तें हैं, जिनकी बात आगे विस्तार से करेंगे।

विवरण जानकारी
प्लान का नाम LIC's Health Shield
बीमा कंपनी Life Insurance Corporation of India (LIC)
प्लान नंबर 907
UIN 512N369V01
प्लान का प्रकार Non-Par, Non-Linked, Health, Individual, Pure Risk Plan
बीमा का प्रकार Fixed Benefit Health Insurance
बिक्री शुरू 19 अक्टूबर 2026
पॉलिसी अवधि 15 साल
प्रीमियम भुगतान अवधि 15 साल
प्रीमियम चुनी गई उम्र, सदस्यों और Daily Benefit के अनुसार
प्रीमियम दर पॉलिसी अवधि के दौरान गारंटीड, पॉलिसी की शर्तों के अधीन
बोनस या मुनाफे में हिस्सा नहीं
मैच्योरिटी बेनिफिट नहीं
पॉलिसी खरीदने का तरीका LIC की वेबसाइट या अधिकृत एजेंट/मध्यस्थ के माध्यम से
मुख्य उद्देश्य अस्पताल में भर्ती और पात्र सर्जरी के दौरान अतिरिक्त आर्थिक सहायता

फिक्स्ड बेनिफिट प्लान और आम मेडिकल पॉलिसी में फर्क

ज्यादातर लोग हेल्थ इंश्योरेंस का नाम सुनते ही कैशलेस इलाज और बिल की भरपाई के बारे में सोचते हैं। यह प्लान उस ढांचे का है ही नहीं। यहां भुगतान अस्पताल के असली खर्च पर नहीं टिका है। पैसा पहले से तय फॉर्मूले से मिलता है।

एक उदाहरण लीजिए। मान लीजिए आपका डेली बेनिफिट ₹5,000 है और आप चार दिन सामान्य वार्ड में रहे। ब्रोशर के हिसाब से आपको 4 × ₹5,000 यानी ₹20,000 मिलेंगे, चाहे अस्पताल ने बिल ₹12,000 बनाया हो या ₹60,000। असली फर्क यही है।

इसके दो पहलू हैं। अच्छा पहलू यह कि अगर इलाज सस्ते में हो गया, तो बचा हुआ पैसा आपके पास ही रहेगा। कमज़ोर पहलू यह कि महंगे अस्पताल में बिल लाखों में गया, तो यह प्लान उसे पूरा नहीं भरेगा। इसे बिल का विकल्प नहीं, बिल के साथ का सहारा समझना ठीक रहेगा।

दूसरा फर्क पैसे के इस्तेमाल का है। बिल की भरपाई वाली पॉलिसी में आम तौर पर पैसा अस्पताल को जाता है। यहां रकम आपको मिलती है, और ब्रोशर में इसके इस्तेमाल पर कोई पाबंदी नहीं लिखी है। आप इसे दवाइयों, घर के खर्च या आने-जाने में लगा सकते हैं।

तीसरा फर्क समय का है। यह पॉलिसी 15 साल की है, और ब्रोशर के अनुसार प्रीमियम पूरी अवधि तक गारंटीड रहता है, यानी बदलता नहीं। कई पॉलिसियों में प्रीमियम समय के साथ बदल सकता है, यहां ऐसा नहीं है। पर 15 साल बाद कवर भी खत्म हो जाता है।

सभी Health Benefits की Overview Table

बेनिफिट कब मिलता है? भुगतान का नियम
Hospital Cash Benefit (HCB) पात्र बीमारी या दुर्घटना के कारण 24 घंटे से अधिक अस्पताल में भर्ती होने पर सामान्य वार्ड में Applicable Daily Benefit (ADB) के आधार पर
ICU Hospital Cash पात्र ICU भर्ती पर ADB का 2 गुना
Major Surgical Benefit (MSB) Annexure में सूचीबद्ध पात्र बड़ी सर्जरी पर सर्जरी की श्रेणी के अनुसार MSB Sum Assured का निर्धारित प्रतिशत
Day Care Procedure Benefit (DCPB) सूचीबद्ध पात्र डे-केयर प्रक्रिया पर ADB का 5 गुना, एकमुश्त
Other Surgical Benefit (OSB) ऐसी पात्र सर्जरी जो MSB या DCPB में शामिल नहीं है ADB का 2.5 गुना प्रति पात्र 24 घंटे की अवधि या योग्य अतिरिक्त अवधि
Medical Management Benefit (MMB) सूचीबद्ध पांच बीमारियों के कारण पात्र इन-पेशेंट भर्ती पर ADB का 2.5 गुना, एकमुश्त
Extended Hospitalisation Benefit (EHB) एक ही लगातार अस्पताल भर्ती 30 दिनों से अधिक होने पर ADB का 10 गुना, एकमुश्त
No Claim Benefit लगातार 3 क्लेम-फ्री पॉलिसी वर्ष पूरे होने पर Initial Daily Benefit का 10% ADB में जोड़ा जाता है
Health Check-up Benefit कवर शुरू होने के 3 पॉलिसी वर्ष पूरे होने के बाद वास्तविक पात्र खर्च, अधिकतम ADB का आधा; इसके बाद प्रत्येक 3 साल पर
Ambulance Benefit पात्र Major Surgical Benefit क्लेम के साथ आपातकालीन एम्बुलेंस खर्च होने पर ₹1,000 एकमुश्त
One-Year Premium Waiver पात्र Category 1 या Category 2 सर्जरी होने पर सभी बीमित सदस्यों की बेस पॉलिसी का एक साल का प्रीमियम माफ; राइडर प्रीमियम नहीं
MSB Restoration एक पॉलिसी वर्ष में MSB की निर्धारित राशि समाप्त होने के बाद पात्र अलग सर्जरी पर शर्तों के अधीन अतिरिक्त सर्जरी लाभ
Auto Health Cover (AHC) मूल Principal Insured की मृत्यु पर बचे हुए सदस्यों का भविष्य का बेस पॉलिसी प्रीमियम माफ और पॉलिसी जारी

LIC Health Shield Plan कौन ले सकता है: उम्र, परिवार और पॉलिसी की अवधि

सबसे पहले उम्र की बात। प्रिंसिपल इंश्योर्ड की उम्र पिछले जन्मदिन के हिसाब से 18 से 65 साल के बीच होनी चाहिए। जीवनसाथी और माता-पिता पर भी यही सीमा लागू होती है। यानी 66 साल के पिता को इस पॉलिसी में नहीं जोड़ा जा सकता।

बच्चों के लिए नियम अलग है। उनकी उम्र कम से कम 90 दिन पूरी और ज्यादा से ज्यादा 20 साल होनी चाहिए। बच्चों का कवर 35 साल की उम्र पर खत्म हो जाता है, जबकि प्रिंसिपल इंश्योर्ड, जीवनसाथी और माता-पिता के लिए कवर की आखिरी उम्र 80 साल है।

अब पॉलिसी की अवधि। प्रिंसिपल इंश्योर्ड और माता-पिता का कवर 15 साल का होता है। जीवनसाथी और बच्चों का कवर पॉलिसी की बची हुई अवधि तक चलता है, पर वह अवधि कम से कम पांच साल होनी चाहिए। प्रीमियम भी पूरे 15 साल भरना पड़ता है।

एक बात लोग अक्सर नज़रअंदाज़ कर देते हैं। अगर माता-पिता दोनों जीवित हैं और पात्र हैं, तो या दोनों कवर होंगे या कोई नहीं। एक को चुनने की छूट नहीं है। यही नियम बच्चों पर भी लागू है। पात्र सभी बच्चे साथ आएंगे या कोई नहीं।

सदस्य न्यूनतम प्रवेश उम्र अधिकतम प्रवेश उम्र कवर समाप्त होने की अधिकतम उम्र
Principal Insured (मुख्य बीमित व्यक्ति) 18 साल 65 साल 80 साल
पति/पत्नी 18 साल 65 साल 80 साल
माता-पिता 18 साल 65 साल 80 साल
बच्चे 90 दिन 20 साल 35 साल

  • मुख्य बीमित व्यक्ति और माता-पिता का कवर 15 साल तक हो सकता है।
  • पति/पत्नी और बच्चों का कवर पॉलिसी की बची हुई अवधि के अनुसार होता है, न्यूनतम 5 साल की शर्त के अधीन।
  • पात्र माता-पिता दोनों जीवित हों, तो दोनों को शामिल करना होगा या किसी को भी नहीं।
  • पॉलिसी शुरू करते समय पात्र बच्चों को शामिल करने या न करने का निर्णय लेना होता है। बाद में सामान्य परिस्थितियों में नए सदस्यों को जोड़ने की अनुमति नहीं है।

इससे भी जरूरी बात यह है कि जो सदस्य पॉलिसी शुरू होते समय नहीं जुड़े, वे बाद में नहीं जोड़े जा सकते। अपवाद सिर्फ दो हैं। पॉलिसी के दौरान शादी होने पर जीवनसाथी, और बच्चा होने या गोद लेने पर वह बच्चा, 12 महीने के भीतर जुड़ सकते हैं। इसलिए शुरू में ही पूरे परिवार के बारे में सोचकर तय करें।

LIC हेल्थ शील्ड पॉलिसी में डेली बेनिफिट कैसे चुनें

पूरी पॉलिसी की धुरी एक ही संख्या है: डेली बेनिफिट। आप इसे ₹2,500 से ₹10,000 के बीच चुन सकते हैं, और रकम ₹500 के गुणकों में होती है। हॉस्पिटल कैश, सर्जरी और बाकी सारे फायदे इसी संख्या से निकलते हैं, इसलिए इसे सोच-समझकर चुनिए।

चुना हुआ ADB MSB Sum Assured
₹2,500 ₹2,50,000
₹3,000 ₹3,00,000
₹5,000 ₹5,00,000
₹7,500 ₹7,50,000
₹10,000 ₹10,00,000

मोटा हिसाब यह है। बड़ी सर्जरी की बीमा राशि डेली बेनिफिट की 100 गुना होती है। ₹5,000 चुना तो ₹5 लाख, ₹10,000 चुना तो ₹10 लाख। डे-केयर पर 5 गुना, दूसरी सर्जरी पर रोज़ 2.5 गुना और ICU में रोज़ दोगुना मिलता है। एक संख्या बदली तो सब कुछ बदल गया।

परिवार के लिए चुनते समय एक नियम याद रखिए। जीवनसाथी का डेली बेनिफिट प्रिंसिपल इंश्योर्ड के बराबर या उससे कम हो सकता है। माता-पिता का जीवनसाथी के बराबर या कम, और सभी माता-पिता का एक जैसा। बच्चों के लिए भी यही बात है। जीवनसाथी न हो तो तुलना प्रिंसिपल से होती है।

एक और सीमा है। किसी एक व्यक्ति के नाम पर इस प्लान की सारी पॉलिसियों को मिलाकर भी डेली बेनिफिट ₹10,000 से ऊपर नहीं जा सकता। यानी अलग-अलग पॉलिसी लेकर सीमा पार करने का रास्ता यहां बंद है।

तो कितना चुनें? इसका कोई एक जवाब नहीं है, पर सोचने का तरीका है। देखिए कि अस्पताल में रहने के दौरान आपके घर का रोज़ का खर्च और आय का नुकसान कितना बैठता है। ऊंचा डेली बेनिफिट चुनने पर प्रीमियम बढ़ता है, पर ₹4,000 या उससे ऊपर पर प्रीमियम में छूट भी मिलती है। फैसला अपने बजट के हिसाब से लीजिए।

LIC हेल्थ शील्ड पॉलिसी में हॉस्पिटल कैश: रोज़ का पैसा कैसे मिलता है

हॉस्पिटल कैश बेनिफिट इस प्लान का सबसे बुनियादी हिस्सा है। शर्त यह है कि बीमारी या चोट पॉलिसी शुरू होने के बाद की हो और भर्ती लगातार 24 घंटे से ज्यादा चले। ऐसा होने पर सामान्य या स्पेशल वार्ड में हर 24 घंटे के लिए एक डेली बेनिफिट मिलता है।

दिन गिनने का तरीका भी समझ लीजिए। 24 घंटे पूरे होने के बाद अगर आप 4 घंटे से ज्यादा और रुके, तो उसे भी एक पूरा दिन माना जाता है। 4 घंटे या उससे कम हो तो उसका अलग पैसा नहीं बनता। इसलिए डिस्चार्ज का समय कभी-कभी फर्क डाल देता है।

ICU का हिसाब अलग है। वहां हर दिन के लिए डेली बेनिफिट का दोगुना मिलता है। मान लीजिए ₹5,000 वाले व्यक्ति को 3 दिन वार्ड और 2 दिन ICU में रखा गया। तब 3 × ₹5,000 और 2 × ₹10,000 जुड़कर कुल ₹35,000 बनते हैं।

अगर एक ही दिन में कुछ घंटे ICU और बाकी समय सामान्य वार्ड में बीते, तो उस दिन को ICU वाला माना जाता है, बशर्ते ICU में कम से कम 4 घंटे लगातार रहे हों। यह नियम छोटा है, पर क्लेम के समय सही रकम निकलवाने में काम आता है।

सीमाएं भी जान लीजिए। पहले पॉलिसी साल में हर सदस्य के लिए ज्यादा से ज्यादा 30 दिन का हॉस्पिटल कैश मिलता है, दूसरे साल से हर साल 90 दिन तक। पूरे कवर में हर सदस्य के लिए कुल 900 दिन की हद है। यह सिर्फ भारत में हुई भर्ती पर मिलता है, और एक सदस्य का बचा हुआ लाभ किसी दूसरे को नहीं दिया जा सकता।

एक अच्छी बात यह है कि सर्जरी या बीमारी वाला बेनिफिट बनने पर भी, अस्पताल में जितने दिन रुके उनका हॉस्पिटल कैश साथ में अलग से मिलता है। डे-केयर इलाज इसमें अपवाद है, उसकी बात आगे आएगी।

एलआईसी की हेल्थ प्लान में बड़ी सर्जरी (मेजर सर्जिकल बेनिफिट) और चार कैटेगरी

ब्रोशर के साथ करीब 260 बड़ी सर्जरी की एक सूची लगी है, और यही इस प्लान का सबसे वज़नदार हिस्सा है। सूची का कोई ऑपरेशन चिकित्सीय ज़रूरत से कराया जाए तो एकमुश्त रकम मिलती है, जिसकी बीमा राशि डेली बेनिफिट की 100 गुना होती है। इसे मेजर सर्जिकल बेनिफिट कहते हैं।

हर सर्जरी पर पूरी बीमा राशि नहीं मिलती। सूची को चार कैटेगरी में बांटा गया है। Category 1 में 100%, Category 2 में 60%, Category 3 में 40% और Category 4 में 20%। ₹5,000 के डेली बेनिफिट पर बीमा राशि ₹5 लाख है, तो ये चारों ₹5 लाख, ₹3 लाख, ₹2 लाख और ₹1 लाख बनते हैं।

Category 1 में सबसे गंभीर ऑपरेशन आते हैं, जैसे बाईपास सर्जरी (CABG), हार्ट वाल्व बदलना, महाधमनी की बड़ी सर्जरी, कैंसर वाले ब्रेन ट्यूमर का ऑपरेशन और हार्ट, फेफड़े, लिवर, किडनी या बोन मैरो का ट्रांसप्लांट। इनमें पूरी 100% राशि मिलती है।

बीच की कैटेगरी में कई जाने-पहचाने नाम भी हैं। पेसमेकर लगाना और तिल्ली निकालना 60% में आता है। कूल्हा या घुटना बदलना और पित्त की थैली का ऑपरेशन 40% में। सिर्फ एक स्टेंट वाली एंजियोप्लास्टी 20% में आती है, जबकि दो या ज्यादा स्टेंट हों तो 40% मिलता है।

कुछ नियम क्लेम में काम आएंगे। एक ही सर्जरी का क्लेम पूरे कवर में दोबारा नहीं होता। एक सिटिंग में दो ऑपरेशन हुए तो सबसे गंभीर पर पूरी राशि और बाकी हर ऑपरेशन की पात्र राशि का 25% मिलता है। डॉक्टर को लिखकर देना होगा कि ऑपरेशन ज़रूरी था, और सर्जरी भारत में होनी चाहिए।

सालाना हद भी है। एक साल में हर सदस्य को ज्यादा से ज्यादा एक बार पूरी बीमा राशि मिलती है, और पूरे कवर में उसकी 10 गुना तक। बीमा राशि खत्म हो जाए तो रीस्टोरेशन का प्रावधान है, बशर्ते नया क्लेम शरीर के किसी दूसरे तंत्र (जैसे हृदय या पाचन) का और किसी दूसरे ऑपरेशन का हो, तथा पिछले क्लेम से जुड़ा न हो। ऐसा ज्यादा से ज्यादा 10 बार हो सकता है।

ऑपरेशन के साथ दो चीज़ें और मिलती हैं। एम्बुलेंस इस्तेमाल हुई हो तो ₹1,000 अलग से, और अस्पताल में रुकने के दिनों का हॉस्पिटल कैश। ₹5,000 वाले व्यक्ति की बाईपास सर्जरी में वार्ड में 7 दिन रुकने पर ₹5,00,000, ₹35,000 और ₹1,000 मिलकर ₹5,36,000 बनते हैं। ICU के दिन हों तो रकम और बढ़ेगी।

LIC हेल्थ शील्ड पॉलिसी में डे-केयर और अन्य सर्जरी

हर इलाज के लिए 24 घंटे भर्ती रहना ज़रूरी नहीं होता। मोतियाबिंद का ऑपरेशन, टॉन्सिल निकालना, एपेंडिक्स की सर्जरी या हर्निया की मरम्मत जैसे कई इलाज कुछ घंटों में निपट जाते हैं। ऐसे 243 प्रोसीजर की अलग सूची डे-केयर बेनिफिट के तहत दी गई है।

सूची का कोई प्रोसीजर कराने पर डेली बेनिफिट की 5 गुना रकम एकमुश्त मिलती है। ₹5,000 वाले के लिए यह ₹25,000 हुआ। हर साल अधिकतम 3 प्रोसीजर और पूरे कवर में 30 तक का लाभ मिल सकता है। एक सिटिंग में कई प्रोसीजर हों तो भुगतान सिर्फ एक का होता है।

यहां एक बारीकी है। डे-केयर प्रोसीजर पर हॉस्पिटल कैश नहीं मिलता, भले आप 24 घंटे से ज्यादा रुक जाएं। अपवाद सिर्फ दो हैं, मेंटेनेंस हीमोडायलिसिस और रेडियोथेरेपी, जिन पर 24 घंटे से कम रुकने पर भी हॉस्पिटल कैश दिया जाता है।

जो ऑपरेशन न बड़ी सर्जरी की सूची में है, न डे-केयर की, उसके लिए अदर सर्जिकल बेनिफिट है। इसमें भर्ती के हर दिन के लिए डेली बेनिफिट की 2.5 गुना रकम मिलती है, बशर्ते भर्ती 24 घंटे से ज्यादा चली हो। ₹5,000 पर यह ₹12,500 रोज़ बैठता है।

इसकी भी सीमा तय है। पहले साल अधिकतम 15 दिन और बाद में हर साल 45 दिन तक, पूरे कवर में 450 दिन। इसके ऊपर हॉस्पिटल कैश भी मिलता है, यानी रोज़ का कुल भुगतान डेली बेनिफिट का साढ़े तीन गुना हो जाता है। फर्क बस इतना है कि दिन गिनकर ही मिलते हैं।

बीमारियों का बेनिफिट और लंबी भर्ती

कुछ बीमारियां मौसम के साथ आती हैं और सीधे अस्पताल पहुंचा देती हैं। इसी को ध्यान में रखकर ब्रोशर में पांच बीमारियों के लिए मेडिकल मैनेजमेंट बेनिफिट रखा गया है: डेंगू, मलेरिया, निमोनिया, फेफड़ों की टीबी और वायरल हेपेटाइटिस A।

इन बीमारियों में भर्ती होने पर डेली बेनिफिट की 2.5 गुना रकम एकमुश्त मिलती है। ₹5,000 वाले को ₹12,500। इसके ऊपर अस्पताल में रुके दिनों का हॉस्पिटल कैश अलग से मिलता है। तो डेंगू में 5 दिन भर्ती रहने पर ₹12,500 और ₹25,000 मिलाकर ₹37,500 बनते हैं।

सीमा यह है कि एक सदस्य को साल में ज्यादा से ज्यादा 2 बार और पूरे कवर में 20 बार यह लाभ मिल सकता है। एक बात और। अगर उसी भर्ती में बड़ी सर्जरी, दूसरी सर्जरी या डे-केयर का बेनिफिट बन रहा है, तो मेडिकल मैनेजमेंट बेनिफिट नहीं मिलता।

अब लंबी भर्ती। अगर कोई एक ही बार में लगातार 30 दिन से ज्यादा अस्पताल में रहे, तो एक्सटेंडेड हॉस्पिटलाइजेशन बेनिफिट के तहत डेली बेनिफिट की 10 गुना रकम मिलती है। ₹5,000 पर ₹50,000। यह बाकी सभी लाभों के अलावा मिलता है।

यह लाभ हर साल में एक बार और पूरे कवर में अधिकतम 10 बार मिलता है। उम्मीद है किसी को इसकी ज़रूरत न पड़े। पर लंबे इलाज में जब आमदनी रुक जाती है, तब इस तरह की एकमुश्त रकम घर का हिसाब संभालने में मदद कर सकती है।

LIC Health Shield Plan, नो क्लेम बेनिफिट और हेल्थ चेकअप

क्लेम न करने वालों को इनाम देने वाली व्यवस्था है, जिसे नो क्लेम बेनिफिट कहते हैं। लगातार तीन पॉलिसी साल बिना किसी क्लेम के गुज़रें तो इनीशियल डेली बेनिफिट का 10% आपके डेली बेनिफिट में जुड़ जाता है। ₹5,000 वाला डेली बेनिफिट तीन साल बाद ₹5,500 हो जाता है।

यह जुड़ाव एक बार का नहीं है। अगले तीन क्लेम-फ्री साल पूरे होने पर फिर ₹500 जुड़ेंगे, और इसकी कोई ऊपरी सीमा नहीं रखी गई है। चूंकि बड़ी सर्जरी की राशि डेली बेनिफिट की 100 गुना होती है, इसलिए हर बार ₹500 बढ़ने पर बड़ी सर्जरी की राशि ₹50,000 बढ़ जाती है।

पर यहां शर्त बारीक है। क्लेम-फ्री साल पूरी पॉलिसी के हिसाब से गिना जाता है। परिवार के किसी भी एक सदस्य का हॉस्पिटल कैश, सर्जरी, डे-केयर या मेडिकल मैनेजमेंट वाला क्लेम बना, तो वह साल गिनती से बाहर हो गया। बड़े परिवार में तीन साल बिना क्लेम निकालना आसान नहीं होता।

बाद में जुड़े सदस्य का क्या? उसका नो क्लेम बेनिफिट भी प्रिंसिपल इंश्योर्ड वाली तारीख पर ही जुड़ता है, पर इसके लिए उसे पॉलिसी में आए कम से कम एक साल पूरा होना चाहिए। उसके बाद सबका बेनिफिट साथ-साथ बढ़ता है।

हेल्थ चेकअप का फायदा भी है। पहले तीन पॉलिसी साल पूरे होने के बाद और फिर हर तीन साल में एक बार, चेकअप का असली खर्च मिलता है, पर डेली बेनिफिट के आधे से ज्यादा नहीं। ₹5,000 पर सीमा ₹2,500 है। रिपोर्ट और बिल की कॉपी देनी होगी, और चेकअप भारत में ही कराना होगा।

क्विक कैश, प्रीमियम माफी और ऑटो हेल्थ कवर

बड़े ऑपरेशन के वक्त सबसे बड़ी दिक्कत होती है पैसे का इंतज़ाम, वह भी तुरंत। इसी के लिए क्विक कैश सुविधा है। अगर Category 1 या 2 की कोई सर्जरी LIC के नेटवर्क अस्पताल में हो रही है, तो भर्ती के दौरान ही मेजर सर्जिकल बेनिफिट की 50% रकम एडवांस मिल सकती है।

मानिए ₹5 लाख की बीमा राशि वाली Category 1 सर्जरी तय हुई। तब अस्पताल में रहते हुए ही ₹2.5 लाख तक एडवांस मिल सकता है। LIC की मंजूरी चाहिए, और बाद में अंतिम क्लेम से यह रकम घटा दी जाती है। सर्जरी पहले से तय हो या दुर्घटना के बाद इमरजेंसी में, दोनों में सुविधा है।

दूसरी राहत है प्रीमियम माफी। Category 1 या 2 की सर्जरी का क्लेम बनते ही अगले एक साल की किस्त पॉलिसी के सभी सदस्यों के लिए माफ हो जाती है। साल में ऐसे कई क्लेम हों, तब भी माफी एक ही बार मिलती है। राइडर का प्रीमियम माफ नहीं होता।

तीसरी चीज़ बहुत अहम है और अक्सर छूट जाती है। अगर मूल प्रिंसिपल इंश्योर्ड की मृत्यु हो जाए, तो ऑटो हेल्थ कवर के तहत बाकी बचे सदस्यों का आगे का पूरा बेस प्रीमियम माफ हो जाता है और पॉलिसी चलती रहती है। माफी अगली पॉलिसी वर्षगांठ से शुरू होती है।

ऐसे में जीवनसाथी नए प्रिंसिपल इंश्योर्ड बन जाते हैं, और जीवनसाथी न हो तो सबसे बड़ी उम्र के जीवित वयस्क सदस्य। नो क्लेम बेनिफिट भी चलता रहता है। शर्तें दो हैं। प्रिंसिपल की मृत्यु के समय पॉलिसी चालू हो, और मृत्यु पॉलिसी शुरू होने या रिवाइवल के 12 महीने के भीतर आत्महत्या से न हुई हो। राइडर का प्रीमियम फिर भी भरना होता है।

आखिरी बात। प्रिंसिपल के अलावा किसी और सदस्य की मृत्यु पर कोई डेथ बेनिफिट नहीं मिलता। बस उस सदस्य का प्रीमियम लगना बंद हो जाता है और बाकी पॉलिसी चलती रहती है। मृत्यु पर पैसा चाहिए तो उसके लिए अलग से राइडर का विकल्प है।

प्रीमियम के असली उदाहरण और छूट

अब वह बात जिसका सबको इंतज़ार होता है, यानी प्रीमियम। इसे चार चीज़ें तय करती हैं: सदस्य की उम्र, उसका जेंडर, चुना हुआ डेली बेनिफिट और यह कि वह प्रिंसिपल इंश्योर्ड है या दूसरा सदस्य। पूरी पॉलिसी का प्रीमियम सभी सदस्यों के अलग-अलग प्रीमियम का जोड़ होता है।

ब्रोशर में ₹5,000 डेली बेनिफिट के कुछ उदाहरण दिए गए हैं। प्रिंसिपल इंश्योर्ड की उम्र 20, 30, 40, 50 और 60 साल होने पर पुरुष का सालाना प्रीमियम ₹6,555, ₹7,195, ₹9,446, ₹14,895 और ₹22,350 है। महिला के लिए यही ₹5,556, ₹6,883, ₹9,509, ₹13,209 और ₹17,341 है।

दूसरे सदस्य जुड़ें तो उनका प्रीमियम अलग से जुड़ता है। जैसे 30 साल के पुरुष प्रिंसिपल के साथ 18 साल का पुरुष सदस्य हो, तो उसका प्रीमियम ₹4,471 बताया गया है। तब ₹7,195 और ₹4,471 जोड़कर कुल ₹11,666 बैठते हैं। ये आंकड़े ब्रोशर के उदाहरण हैं, अंतिम रकम नहीं।

छूट की तालिका भी है। ₹4,000 या ऊपर के डेली बेनिफिट पर प्रिंसिपल को ₹400 से ₹2,800 तक और हर दूसरे सदस्य को उसकी आधी छूट मिलती है। ₹5,000 पर यह ₹700 और ₹350, ₹7,000 पर ₹1,400 और ₹700, तथा ₹10,000 पर ₹2,800 और ₹1,400 है।

चुकाने के तरीके दो हैं, सालाना और छमाही। छमाही किस्त के लिए सालाना प्रीमियम को 0.5090 से गुणा किया जाता है, यानी दो किस्तें मिलाकर सालाना से थोड़ी ज्यादा पड़ती हैं। ऑनलाइन सीधे LIC की वेबसाइट से लेने पर, यानी किसी एजेंट या ब्रोकर के बिना, बेस प्लान और राइडर पर 10% की अलग छूट है। टैक्स ऊपर से लगते हैं।

कुछ सावधानी की बात। प्रीमियम पूरे 15 साल भरना पड़ता है, और बीच में पॉलिसी छोड़ने पर कोई सरेंडर वैल्यू या पेड-अप वैल्यू नहीं मिलती। इसलिए कुल प्रीमियम का हिसाब 15 से गुणा करके भी देखिए, फिर तय कीजिए कि यह सालाना खर्च लंबे समय तक चलाना आसान रहेगा या नहीं।

राइडर और नए सदस्य जोड़ना

बेस प्लान में सिर्फ हेल्थ बेनिफिट हैं, जान के जोखिम का कवर नहीं। उसके लिए दो राइडर उपलब्ध हैं: LIC का न्यू टर्म एश्योरेंस राइडर और एक्सीडेंट बेनिफिट राइडर। दोनों के लिए अलग से प्रीमियम लगता है, और दोनों का मिलाकर प्रीमियम बेस प्लान के प्रीमियम के 30% से ज्यादा नहीं हो सकता।

टर्म एश्योरेंस राइडर प्रिंसिपल इंश्योर्ड और जीवनसाथी, दोनों ले सकते हैं, पर सिर्फ पॉलिसी में आते समय। इसकी राशि मेजर सर्जिकल बेनिफिट की बीमा राशि तक हो सकती है, और जीवनसाथी की राशि प्रिंसिपल से ज्यादा नहीं रखी जा सकती। राइडर की बची अवधि कम से कम पांच साल हो और उम्र 60 साल (नज़दीकी जन्मदिन) से पहले की हो।

एक्सीडेंट बेनिफिट राइडर पॉलिसी के दौरान कभी भी लिया जा सकता है, पर प्रीमियम की बची अवधि कम से कम पांच साल हो और उम्र 65 साल (नज़दीकी जन्मदिन) से कम हो। दुर्घटना से मृत्यु होने पर राइडर की राशि मिलती है। इसका कवर बेस प्लान की बची प्रीमियम अवधि या (70 घटा प्रवेश आयु) साल, इनमें से जो कम हो, तब तक चलता है।

अब नए सदस्य। पॉलिसी चलते हुए शादी हुई तो जीवनसाथी को शादी या दोबारा शादी की तारीख से 12 महीने के भीतर जोड़ा जा सकता है। बच्चे के जन्म या गोद लेने पर भी 12 महीने की यही खिड़की है। दोनों में पॉलिसी की बची अवधि कम से कम पांच साल होनी चाहिए, और घटना का सबूत देना होगा।

नए सदस्य पर LIC की अंडरराइटिंग नीति, वेटिंग पीरियड और बाकी शर्तें नए सिरे से लागू होती हैं। कवर और बढ़ा हुआ प्रीमियम अगली पॉलिसी वर्षगांठ से शुरू होता है। जोड़ने का हक सिर्फ मूल प्रिंसिपल इंश्योर्ड को है, उसकी मृत्यु के बाद कोई नया सदस्य नहीं जुड़ सकता।

हटाने का नियम भी है। मृत्यु या तलाक की स्थिति में प्रिंसिपल लिखकर किसी सदस्य को हटवा सकता है, और उस सदस्य का प्रीमियम अगली किस्त की तारीख से बंद हो जाता है। बाकी स्थितियों में सदस्य हटाना LIC की मर्ज़ी पर है।

हेल्थ पॉलिसी की वेटिंग पीरियड

कोई भी हेल्थ पॉलिसी लेते समय सबसे ज्यादा उलझन वेटिंग पीरियड पर होती है, इसलिए इसे ध्यान से पढ़िए। इस प्लान में पहली बाधा 90 दिन की है। पॉलिसी शुरू होने के बाद 90 दिन तक बीमारी के कारण हुई भर्ती या सर्जरी पर कोई लाभ नहीं मिलता।

अच्छी बात यह है कि दुर्घटना पर यह रोक लागू नहीं होती। अगर चोट पॉलिसी शुरू होने के बाद लगी है, तो पहले ही दिन से हॉस्पिटल कैश या सर्जरी का फायदा बन सकता है। रोक सिर्फ बीमारी पर है।

दूसरी बाधा 2 साल की है, कुछ तय बीमारियों और इलाज पर। सूची लंबी है: मोतियाबिंद, पित्त की पथरी, किडनी और मूत्र मार्ग की पथरी, हर्निया, हाइड्रोसील, बवासीर, गुदा की फिस्टुला या फिशर, साइनस, स्लिप डिस्क, घुटना या जोड़ बदलना (दुर्घटना को छोड़कर), ऑस्टियोपोरोसिस और किडनी फेल्योर।

उसी सूची में गर्भाशय की सौम्य गांठें, सौम्य थायरॉइड रोग, प्रोस्टेट का सौम्य बढ़ना, टॉन्सिल या एडिनॉइड की तकलीफ, वैरिकोज वेन, कार्पल टनल सिंड्रोम, पेट या आंत का अल्सर, आंख के पर्दे की बीमारियां और ऑस्टियोआर्थराइटिस भी हैं। ये सब पहले दो साल तक कवर नहीं होंगे, और इनसे होने वाली जटिलताएं भी नहीं।

मान लीजिए आपने आज पॉलिसी ली और छह महीने बाद मोतियाबिंद का ऑपरेशन करवाना पड़ा। डे-केयर की सूची में होने के बावजूद उस पर क्लेम नहीं बनेगा, क्योंकि दो साल पूरे नहीं हुए। इसलिए जिन इलाज की ज़रूरत पहले से दिख रही हो, उनके लिए अलग इंतज़ाम सोचकर रखिए।

पॉलिसी लैप्स होकर दोबारा चालू कराई गई तो वेटिंग पीरियड फिर लागू हो सकता है। पहली अनपेड किस्त की तारीख से 90 दिन के भीतर रिवाइवल मांगा तो सामान्य वेटिंग 45 दिन की रहती है, उसके बाद मांगा तो 90 दिन की। दो साल वाला पीरियड नए सिरे से तभी शुरू होता है जब रिवाइवल 90 दिन के बाद कराया जाए।

क्या कवर नहीं होगा

अब वह हिस्सा जिसे लोग पढ़ना नहीं चाहते, पर जो क्लेम के दिन सबसे ज्यादा मायने रखता है। सबसे पहले पहले से मौजूद बीमारियां। जिस बीमारी का निदान या इलाज पॉलिसी शुरू होने से पहले 36 महीने के भीतर हुआ हो, उसे तभी कवर मिलेगा जब आपने पहले बताकर LIC से मंज़ूरी ले ली हो।

इसका सीधा मतलब है कि प्रस्ताव फॉर्म में अपनी और परिवार की सेहत की हर बात ईमानदारी से लिखिए। छिपाने पर क्लेम फंस सकता है, और बीमा अधिनियम की धारा 45 के तहत LIC पहले तीन साल में पॉलिसी पर सवाल उठा सकती है। तीन साल बाद आम तौर पर ऐसा नहीं हो सकता।

गर्भावस्था और प्रसव का कोई खर्च कवर नहीं होता, सिजेरियन भी नहीं। अपवाद सिर्फ एक्टोपिक प्रेग्नेंसी है। दांतों का इलाज दुर्घटना की स्थिति में ही कवर है। सिर्फ सुंदरता के लिए कॉस्मेटिक सर्जरी, चश्मे, लेसिक जैसी आंख की नंबर वाली सर्जरी, बांझपन का इलाज और सेक्स चेंज भी बाहर हैं।

भारत के बाहर हुई भर्ती या इलाज पर कुछ नहीं मिलता। 24 घंटे से कम की भर्ती पर भी नहीं, सिवाय डे-केयर और डायलिसिस-रेडियोथेरेपी के। सिर्फ जांच, चेकअप, टीकाकरण या आराम के लिए भर्ती होना, और प्री-पोस्ट हॉस्पिटलाइजेशन का खर्च भी इस प्लान में कवर नहीं है।

आयुष इलाज यानी आयुर्वेद, योग, यूनानी, सिद्ध या होम्योपैथी की भर्ती तभी कवर होती है जब वह सरकारी अस्पताल या सरकार से मान्यता प्राप्त संस्थान में हो और कम से कम 24 घंटे चली हो। स्पा, नेचर-क्योर क्लिनिक, मसाज या डिटॉक्स जैसे इलाज बाहर हैं। एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर भी।

खुद को पहुंचाई चोट या आत्महत्या की कोशिश, नशीली चीज़ों का असर, युद्ध, दंगे, आतंकवाद, पेशेवर या खतरनाक खेल जैसे स्कूबा डाइविंग, पैराशूटिंग और बंजी जंपिंग, और गैरकानूनी काम से हुई चोट भी बाहर है। मोटापा घटाने के इलाज, नींद की बीमारी और हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी भी कवर नहीं होतीं।

ग्रेस, रिवाइवल, फ्री लुक और जो नहीं मिलता

प्रीमियम की तारीख चूक गए तो घबराइए मत। 30 दिन का ग्रेस पीरियड मिलता है, जिसमें पॉलिसी बिना रुकावट चालू मानी जाती है। इस बीच क्लेम बन गया तो बकाया प्रीमियम काटकर बाकी रकम दी जाती है। यह छूट राइडर के प्रीमियम पर भी लागू है।

ग्रेस पीरियड भी बीत गया तो पॉलिसी लैप्स हो जाती है और सारे लाभ बंद। पर रास्ता खुला है। पहली अनपेड किस्त की तारीख से पांच पूरे साल के भीतर, पॉलिसी अवधि खत्म होने से पहले, आप पॉलिसी चालू करा सकते हैं। इसके लिए सारा बकाया प्रीमियम ब्याज के साथ भरना होता है।

ब्याज दर हर 1 मई से 30 अप्रैल के लिए तय होती है। 1 मई 2026 से 30 अप्रैल 2027 के लिए यह 9.5% सालाना है, छमाही चक्रवृद्धि। साथ में LIC हर सदस्य की बीमा-योग्यता फिर देखती है, और अपनी शर्तों के साथ मंज़ूर करने या मना करने का हक रखती है। लैप्स अवधि में हुई किसी घटना का पैसा नहीं मिलता।

पॉलिसी हाथ में आए तो उसे ध्यान से पढ़िए। शर्तें पसंद न आएं तो पॉलिसी दस्तावेज़ मिलने के 30 दिन के भीतर लौटाकर प्रीमियम वापस मांग सकते हैं। रकम में से स्टांप ड्यूटी, उस अवधि का जोखिम प्रीमियम और मेडिकल जांच का खर्च कटेगा। इसे फ्री लुक पीरियड कहते हैं।

अब वे चीज़ें जो इस प्लान में नहीं मिलतीं। कोई मैच्योरिटी बेनिफिट नहीं, यानी 15 साल पूरे होने पर कुछ वापस नहीं आता। कोई सरेंडर वैल्यू, लोन या पेड-अप वैल्यू नहीं। कोई बोनस नहीं। पैसा सिर्फ तब मिलता है जब ऊपर बताई घटनाओं में से कोई घटे। इसे बीमा की तरह देखें, बचत की तरह नहीं।

टैक्स के बारे में ब्रोशर साफ कहता है कि प्रीमियम और बेनिफिट पर आयकर के असर के लिए अपने टैक्स सलाहकार से पूछिए। इसलिए यहां कोई दावा नहीं किया जा रहा। इस बात को आप अपने सलाहकार से पक्का कर लें।

किसे लेना चाहिए और किसे सोचना चाहिए

अब सबसे ज़रूरी सवाल: क्या यह प्लान आपके लिए ठीक है? इसका कोई बंधा-बंधाया जवाब नहीं है, पर कुछ बातें जांच सकते हैं। यह प्लान उस इंसान के लिए सही बैठता है जो अस्पताल में भर्ती के दौरान रोज़ का तय पैसा चाहता है, ताकि कमाई रुकने और बिल, दोनों का झटका कुछ कम लगे।

जिन परिवारों में कमाने वाला एक ही हो, उनके लिए यह इसलिए काम का हो सकता है कि उसके अस्पताल में रहने के दिनों में भी घर का खर्च चलते रहने का एक सहारा बन जाता है। प्रिंसिपल इंश्योर्ड की मृत्यु पर बाकी परिवार का प्रीमियम माफ होना भी इसी सोच से जुड़ी राहत है।

पर इसे अकेला हेल्थ कवर मानने से बचिए। बड़े अस्पताल में महंगे इलाज का पूरा बिल इसकी तय रकम से बहुत ऊपर जा सकता है। जिनके पास पहले से बिल की भरपाई करने वाली पॉलिसी या दफ्तर का ग्रुप कवर है, उनके लिए यह उसके ऊपर की एक परत हो सकती है। जिनके पास वह नहीं है, उन्हें दोनों तरह के कवर की तुलना करके देखना चाहिए।

जिन्हें इलाज की ज़रूरत पहले से दिख रही हो, जैसे मोतियाबिंद या घुटना बदलना, उन्हें वेटिंग पीरियड देखकर चलना होगा। और जिन्हें बुढ़ापे तक की लंबी सुरक्षा चाहिए, उन्हें याद रखना होगा कि यह पॉलिसी 15 साल चलती है, और ब्रोशर में इसके बाद के नवीनीकरण का कोई ज़िक्र नहीं है।

आखिरी सलाह। कोई भी पॉलिसी लेने से पहले वेटिंग पीरियड, एक्सक्लूजन और सर्जरी की सूची खुद पढ़िए। अपनी उम्र और परिवार के हिसाब से डेली बेनिफिट चुनिए। प्रीमियम का सही आंकड़ा LIC की वेबसाइट या अपने बीमा सलाहकार से लीजिए। यह पोस्ट जानकारी है, निजी वित्तीय सलाह नहीं।

आम सवाल-जवाब (FAQs)

क्या यह पॉलिसी पूरी ज़िंदगी चलती है?

नहीं। पॉलिसी अवधि 15 साल है और प्रिंसिपल इंश्योर्ड का कवर भी 15 साल का है। बच्चों का कवर 35 साल की उम्र पर और बाकी सदस्यों का 80 साल की उम्र पर खत्म होता है, जो भी पहले आए।

क्या असली बिल से ज्यादा पैसा मिल सकता है?

हां, क्योंकि भुगतान असली खर्च से नहीं, तय फॉर्मूले से होता है। पर उल्टा भी उतना ही सच है। बिल बहुत बड़ा बना तो मिलने वाली रकम उससे कम भी हो सकती है। इसलिए इसे बिल की भरपाई वाली पॉलिसी की तरह न देखें।

क्या कैशलेस इलाज मिलता है?

ब्रोशर में कैशलेस का कोई ज़िक्र नहीं है। हां, Category 1 और 2 की सर्जरी नेटवर्क अस्पताल में हो तो क्विक कैश के तहत 50% एडवांस मिल सकता है, जिसके लिए LIC की मंजूरी चाहिए।

क्या माता-पिता को जोड़ सकते हैं?

हां, अगर उनकी उम्र 18 से 65 साल के बीच है। पर दोनों जीवित और पात्र हों तो या दोनों जुड़ेंगे या कोई नहीं, और यह फैसला पॉलिसी शुरू होते समय ही लेना होता है।

क्लेम के लिए क्या देना पड़ता है?

ब्रोशर के अनुसार भर्ती या सर्जरी का सबूत, और सर्जरी के मामले में किसी योग्य डॉक्टर या सर्जन की पुष्टि कि वह ज़रूरी थी। हेल्थ चेकअप के लिए मेडिकल रिपोर्ट और बिल की कॉपी चाहिए। बाकी कागज़ों की पूरी सूची के लिए LIC से पूछिए।

क्या दो पॉलिसी लेकर ₹10,000 से ज्यादा डेली बेनिफिट मिल सकता है?

नहीं। किसी एक व्यक्ति के नाम पर इस प्लान की सभी पॉलिसियों का कुल डेली बेनिफिट ₹10,000 से ऊपर नहीं जा सकता।

ऑनलाइन लें या एजेंट से?

दोनों रास्ते खुले हैं। ऑनलाइन सीधे LIC की वेबसाइट से लेने पर प्रीमियम में 10% छूट है। एजेंट के साथ आपको शर्तें समझने और साथ बैठकर सदस्यों के हिसाब से डेली बेनिफिट तय करने की सुविधा मिलती है। पसंद आपकी है।

प्रीमियम भरना भूल गया तो?

30 दिन का ग्रेस पीरियड मिलता है। उसके बाद पॉलिसी लैप्स हो जाती है, पर पहली अनपेड किस्त की तारीख से पांच साल तक ब्याज सहित बकाया भरकर उसे चालू कराया जा सकता है, LIC की शर्तों के अधीन।

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Suraj Barai

Hi, I’m Suraj Barai—an IRDAI-authorised insurance advisor representing LIC of India, Niva Bupa, and SBI General Insurance. As an active practitioner, Udemy instructor, and Kindle author, I write practical sales guides for insurance advisors—sharing real-world sales lessons learned directly from the field to help you master prospecting, objection handling, and sales growth.

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